akbar Aur birbal
akbar Aur birbal

शायद ही भारत में कोई ऐसा शख्स हो जिसने अकबर बीरबल के किस्से न पढ़े हो और उन्हें पढ़ने के बाद बीरबल की बुद्धि की प्रंशसा न की हो. दरअसल, बीरबल मुगल काल के एक बहुत बड़े कवि, राजनीतिज्ञ और चतुर दिमाग वाला व्यक्ति थे. बता दें, अकबर के जीवन पर बीरबल का बहुत प्रभाव पड़ा था क्योंकि बीरबल हर वक्त बादशाह अकबर के साथ रहते थे. इसके अलावा, बीरबल मुगल शासक अकबर के दरबार के प्रसिद्ध सलाहाकार होने के साथ- साथ उनके अच्छे दोस्त भी थे. सिर्फ इतना ही नही बीरबल बेहद चतुराई के साथ अकबर की मुश्किलो को हल करते थे. इसी बात से प्रसन्न होकर अकबर ने उन्हें कविराय तथा बीरवर की उपाधि दी.

बीरबल का अंतिम संस्कार हो सकें
बीरबल का अंतिम संस्कार हो सकें

वैसे तो इन दोनों के हंसी मज़ाक के किस्से सबकी जुबानी रहते है परंतु बहुत ही कम लोग जानते है कि बीरबल की मौत बेहद दर्दनाक तरीके से हुई थी. सन 1586 ईस्वी में अफगानिस्तान के युसुफजई समुदाय के लोगों ने मुगल सल्तनत के विद्रोह कर दिया. उसके दमन के लिए कबर ने अपने वजीर जैन कोका खान के नेतृत्व में एक दल भेजा लेकिन यह दल हार गया और वापिस आ गया. इसके बाद अकबर ने अपना दूसरा सैन्य दल बीरबल के नेतृत्व में भेजा. लेकिन बुद्धि कौशल के महारथी को सैन्य अभियानों का कोई अधिक अनुभव नही था. ऐसे में  जब बीरबल युद्ध क्षेत्र में पहुंचे तो अन्य मुस्लिम राजाओं ने हिन्दू राजा के साथ युद्ध करने से मना कर दिया. लेकिन फिर भी बीरबल ने युद्ध किया इस युद्ध में बीरबल के साथ आठ हज़ार सैनिक लड़ रहे थे.अकबर

ऐसे में अफगानियों ने हथियार और पत्थरों से ऐसा ज़ोर का चौतरफा हमला बोला कि पता ही नही चला कि कब बीरबल और बीरबल की सेना उन सबके नीचे दब कर मर गई. वहीं, इस युद्ध में जब राजा बीरबल के शव को खोजना चाहा तो उनका शव कहीं भी न मिला. तब तब अकबर ने सभी आठ हजार शवों को अग्नि द्वारा अंतिम संस्कार कर दिया ताकि बीरबल का भी अंतिम संस्कार हो सके. किसी की मौत पर भी बादशाह सलामत को इतना गम नही हुआ था, जितना उन्हें बीरबल की मौत पर हुआ.

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