अपराध के ग्राफ ने घटाया परम्परा का सौहार्द

अपराध: समाज और फिल्मों में

Crime In Society & Indian Movies
Crime In Society & Indian Movies

एक हॉलीवुड फिल्म में इंडिया में फिल्माए गए सीन में गैंगस्टर कत्ल करने के लिए दीवाली का दिन चुनता है. गैंगस्टर अपने डायलॉग में तर्क देता है कि इस दिन मुंबई में/ इंडिया के किसी भी शहर में पटाखों की इतनी आवाजें आती हैं कि उसकी पिस्तौल से निकलने वाली धमाके की आवाज उन्हीं आवाजों के साथ गड्डमड्ड हो जाएगी, और वह आसानी से हत्या के काम को अंजाम दे सकेगा. बाद में कई बम्बईया कमर्सियल फिल्मो में भी दीवाली के मौके पर अपराध, हत्या या बलात्कार के सीन फिल्माने का एक सतत सिलसिला नजर आता रहा. इसी तरह होली जैसा त्यौहार को भी फिल्मों में अपराध के लिए कई बार इस्तेमाल किया गया. दरअसल, फिल्मों में अपराध के यह उदाहरण असल जिंदगी से ही निकल कर आए हैं. यह अलग बात है कि अब कई बार फिल्मों से ऐसे तरीकों को सीखकर अपराधी असल जिंदगी में इनका उपयोग करता रहा है.

त्यौहार में भय और दहशत, अपराध कैसे कैसे :

Crime In Indian Festivals
Crime In Indian Festivals

सवाल दरअसल यह है कि इससे भारतीय परम्पराओं से जुड़े त्योहारों पर भी खासा असर हुआ है. ऐसे मौज- मस्ती और सेलेब्रेशन के मौकों को अब हम दहशत और आशंका के साथ भी देखते हैं. इन मौकों पर कोई भी परिजन अपने बच्चों को आसानी से घर से बाहर जाने की अनुमति नहीं देते हैं. अगर किसी को अनुमति मिल भी गई तो उन्हें अपने माँ- बाप की हिदायत भी साथ में मिलती है. आम लोगों में त्यौहार के अवसरों पर होने वाली आशंका, भय एक तरह से जायज भी है. अक्सर होली, दीवाली और नए वर्ष के सेलेब्रेशन के दूसरे दिन अखबार ज्यादातर अपराधों की खबरों से भरे नजर आते हैं. देश के उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में इन दिनों में खासतौर से अपराध के ग्राफ में उल्लेखनीय इजाफा देखा गया है. बिहार में होली के दिन रंग लगाने की आड़ में एक युवती को एसिड अटेक का शिकार होना पड़ा था. लेकिन यह प्रकरण त्यौहार की आड़ में दबकर रह गया. यहां सिर्फ यह कहना सही नहीं है कि इन दिनों में अपराधी किसी संघठित (आॅर्गनाइज) क्राइम को ही अंजाम देने के लिए उपयोग करते हैं, बल्कि शराब, ड्रग के नशे और अति उत्साह और उन्माद के कारण भी इन दिनों में कई तरह की अप्रत्याशित घटनाएं हो रहीं हैं, मसलन, एक्सीडेंट इत्यादि. पूरी दुनिया में धूमधाम के साथ मनाया जाने वाला न्यू ईयर भी अपराधों से अछूता नहीं रहा है.

परम्पराओं से हुआ मोह भंग

Ganesh Festivals
Ganesh Festivals

पार्टी और नशे की जद में हादसे, बलात्कार, जबरदस्ती या भगदड़ के कारण एक दो नहीं, बल्कि कई त्यौहार के प्रति लोगों का मोह भंग हुआ है. अपराधियों की ऐसी योजनाबद्ध या अचानक होने वाली अप्रत्याशित घटनाओं के चलते निश्चततौर पर भारत की इन लोक परमपराओं पर असर पड़ा है. त्योंहारों की आड़ में बढ़ते अपराध के ग्राफ ने कहीं न कहीं फेस्टिवल के सौहार्द को कम किया है. अगर ऐसा नहीं होता तो इन अवसरों पर शाषन को अतिरिक्त पुलिस बल और सुरक्षा के प्रबंध करने की जरूरत ही नहीं होती. वहीं भारत में अब सामूहिक और संयुक्त परिवार की अवधारणा भी खत्म हो रही है. जिसके कारण अब न्यूक्लियर फैमिली में बदलते परिवार भी बगैर किसी भय और आशंका के त्यौहार मनाना चाहते हैं, इसलिए होली हो या दीवाली वे इसे अपने परिवार के साथ चार दीवारी में ही मनाना चाहते हैं.

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